समान्य प्रशासन विभाग की तबादलो को लेकर पूरी तैयारी- जिले में तीन साल से ज्यादा ठहरे अधिकारियों की लिस्ट तैयार- जनजाति कार्य विभाग प्रमुख के साथ और भी अधिकारी। जिला प्रमुख भी बदलने की कगार पर।



नियम के मुताबिक 3-4 साल के भीतर अधिकारियों का स्थानांतरण होता है खासकर यह नियम जनजातिय कार्य विभाग में पालन होते देखने को मिलता है। जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त ने तीन साल पूरे कर लिये है और चौथा साल भी पिछ्ले तीन सालो की तरह मन माफिक चला रहे हैं। 
सन 1986 से जिन अधिकारियों ने जनजातीय कार्य विभाग का प्रभार संभाला वो लगभग दो से तीन साल तक ही टिके रहे। कुछेक थे जिन्होनें 2 या 3 वर्ष से ज्यादा समय जिले में सहायक आयुक्त बनकर बिताया जैसे की आर सी भारती, बीजी मेहता, मोहिनी श्रीवास्तव, बताते थे कि इन अधिकारीयों की ऊपर तक पहुंच थी, तभी तो ज्यादा समय रह कर विभाग में ज्यादा से ज्यादा योजनाओ में सेंध लगाई। और इस बार भी आयुक्त चौथा साल चला रहे है, विभागीय सूत्रो के अनुसार जिले में मनमर्जी अनुसार जमे रहना उच्च स्तरीय सेटिंग की ओर इशारा करता है। 




बुद्धिजीवियों के मतानुसार ज्यादा समय जिले पर पदस्थ होने से प्रशासनिक कार्यों की क्षमता में कमी देखने को मिलती है। इसलिए विभागीय प्रमुख सचिव को इस विभाग में लंबे समय से जमे अधिकारियों की समीक्षा करने की जरूरत बताई जाती है। तभी तो सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं का क्रियान्वयन धरातल में सुचारू रूप  एवं गंभीरता से किया जा सकता है। 
जानकारी अनुसार सहायक आयुक्त प्रशांत आर्य नें वर्ष 2018 के अक्टूबर माह में पदभार संभाला था।

दरअसल समान्य प्रशासन विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है, अब केबिनेट की मंजूरी लेना बाकी हैं। उसके बाद तबादलों पर लगा हुआ प्रतिबंध हट जायेगा। और तबादला नीति 22-23 के अनुसार जिले में तबादले शुरू हो जायेगे। नीति के प्रारुप में प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से जिले के अंदर स्थानांतरण किये जा सकेगे, साथ ही किसी भी संवर्ग में 20 प्रतिशत से ज्यादा तबादले नहीं किये जा सकेगे। 

हालांकि, चुनाव के चक्कर में समान्य प्रशासन विभाग को तबादला नीति लागू करने में समय लग गया, फिर सरकार को यह भी देखने को मिल गया कि चुनाव के इस दौरान में किस अधिकारी ने दिया गया काम पुरा नहीं किया। जिले में भी एक ऐसा अधिकारी है जिसे चुनाव में एक काम सौपा था उसे वो पूरा नहीं कर पाया। लिस्ट में उसका नाम भी चढ़ने को तैयार है।

बहरहाल, कहावतें चरितार्थ भी होती है, कहते है जिले के अमुख और प्रमुख की कहानी के पन्नों में जिले कि गाथा अब ज्यादा नहीं लिख पाएगी जिसका आभास स्वयं उस प्रमुख को हो चूका है। क्युंकि तबादला नीति का प्रारुप जल्द ही केबिनेट में पास हो जायेगा। 

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