पुराने DPC की गबन कथा में सबके रंगे हाथ-नये DPC भी उसी दलदल के कीचड़ में, पुराने DPC के शागिर्द नहीं चाहते चुटकी भर भी बदलाव।



तबादलों की आग अभी बुझी नहीं है, उस पर जो अधिकारी स्थानतरित हुआ उसका कार्यकाल जबरदस्त घोटालें से भरा हुआ रहा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। 
जिले में रहते हुये तत्कालीन DPC ने अपने वल, जाति वर्ण के कर्मचारियों को ज्यादा तवज्जू दी फिर उसको जो तत्कालीन DPC की तरफ पूरी तरह से नतमस्तक हुआ। यानी की DPC कहे रात को दिन तो वो भी दिन ही कहें। बस फिर सरकार से भितरघात और सरकारी धन का भ्रष्टाचार शुरू हो गया। 



नवीन बालक आवासीय छ्त्रावास जिस दिन से संचालित किया गया है उसी दिन से विवादो में रहा और सुर्खियों में रहा, जब जब जिसने आवाज उठाई तब तब तत्कालीन DPC ने उसकी आवाज दबाई, फिर खासमखास चपरासी को उसका पता बताया। 
सूत्रो के मुताबिक तत्कालीन DPC बहुत से मामलों में रात के अंधेरे में नामी नेताओ के यहा जाते। 

अनाधिकृत छात्रावास बहुत समय से शुरू नहीं हो पा रहा था मगर अगस्त 2018 में अचानक से रातितालई स्कूल परिसर में एक ऐसे गोडाउन में ओपन हुआ जहां स्कूलों की रद्दी भरी पड़ी थी। किताबों की रद्दी का भी घोटाला इसमें शामिल है और पलंग घोटाला भी इससे संबंध रखता हैं। फिर बिना लिखित आदेश के रातितालाई परिसर के उस रद्दी से भरे गोडाउन में ताबड तोड़ छात्रावास बनाने की कवायद शुरू हो गयी। उसमें निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। रंगाई हो गयी, पुताई हो गयी। 
और तो और बच्चे भी आ गये। एक वक्त ऐसा भी था की कुछ बच्चे भी थे और आंगन में रद्दी बिखरी हुई थी। 
जानकारों की जानकारी के अनुसार यहा तक कि एक रिटायर टीचर को सहायक अधीक्षक बनाया गया। फिर एक सिक्का उछला और नतमस्तक होस्टल अधीक्षक मिल गया। जिसको जो कहा उसने वो किया। 
प्रारम्भ में न प्राचार्य से अनुमति पत्र लिया, बस मुखाग्र था कि कलेक्टर साहब ने बोला है तो करना ही पड़ेगा।
बहुत से ऐसे कार्य है जिनको करवाने के लिये तत्कालीन DPC ने इस वाक्य का उपयोग किया।
इस छात्रावास के भी बडे घोटाले है, मुख्यालय पर खुलना था फिर पूर्व विधायक के गांव में भी,
मगर इस छात्रावास को रातितालाई परिसर के गोडाउन में कब्जा कर के खोला गया। जिसकी भी पूर्ण जांच हो तो DPC  सहित दो APC भी घेरे में आ जायेगे। एक वित्तिय वाला और एक E&R वाला। 
झाबुआ में पन्नी बिनने वालों बच्चों के लिये यह छात्रावास खोला गया लेकिन, 50 बच्चों में ऐसे बच्चें थे ही नहीं जो पन्नीया बिनते या शहर में भटकते हैं। 
दबी जुबां के बताने वाले बताते है कि कुछ महिने छात्रावास का संचालन दूसरे छात्रावास से किया गया, और बिलिन्ग नवीन छात्रावास के नाम पर बनाई जाती। जब भी इसकी सूक्ष्मता से जांच की जायेगी तो सारे छिलके निकल जायेगे और तात्कालीन DPC की धूर्तता सामने आ जायेगी। 



हालांकि किसी रिक्त बिल्डिंग में इसे क्यूं नहीं खोला गया, या जहां शुरू किया वहां की सामग्री को किस तरह गायब किया गया यह भी जांच में महत्त्वपूर्ण विषय हैं। क्युकिं अधिकारी ने बच्चों का भविष्य बिगाड़ कर उनका हक़ मारा हैं। 

बहरहाल नये DPC ने भी उन्हीं शागिर्दो के साथ कदम ताल शुरू कर दी हैं, ऑफिस के साथ भी ऑफ़िस के बाद भी। फिर अब धीरे-धीरे बच्चों की पढ़ाई के लिये स्कूल होस्टल भी खुलने वाले हैं। 
ध्यान रहे जांच शुरू हो तो DPC ऑफ़िस के सभी कर्मचारियों को मूल पद पर भेजा जाये, अन्यथा जांच प्रभावित हो सकती है और नये DPC की छलनी के छेद भी बड़े हो सकते हैं।

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